सड़कें पिघलीं, पटरियां उखड़ीं, 1300 मौतें! यूरोप में गर्मी ने क्यों तोड़े सारे रिकॉर्ड, भारत से ज्यादा खतरनाक कैसे?

स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी… इन देशों का नाम सुनते ही दिमाग में बर्फ से ढके पहाड़, खूबसूरत सड़कें और ठंडा मौसम याद आता है। लेकिन इस समय पूरा यूरोप भीषण गर्मी की चपेट में है। हालात इतने खराब हैं कि कई जगह सड़कें पिघल रही हैं, रेलवे की पटरियां टेढ़ी हो रही हैं और शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक करीब 1,300 लोगों की जान गर्मी से जुड़ी परिस्थितियों में जा चुकी है।

आखिर यूरोप में इतनी तबाही क्यों?

यूरोप इस समय एक शक्तिशाली हीट डोम (Heat Dome) की गिरफ्त में है। यह ऐसी मौसमीय स्थिति होती है जिसमें गर्म हवा का एक विशाल गुंबद किसी क्षेत्र के ऊपर फंस जाता है। इससे कई दिनों तक तापमान लगातार बढ़ता रहता है और रात में भी गर्मी कम नहीं होती।

सड़कें और रेलवे ट्रैक क्यों पिघल रहे हैं?

यूरोप के कई देशों का इंफ्रास्ट्रक्चर अत्यधिक गर्मी के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। लंबे समय तक 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान रहने पर डामर (Asphalt) की सड़कें नरम पड़ने लगती हैं और रेलवे की स्टील पटरियां फैलकर टेढ़ी हो सकती हैं। इससे यातायात और रेल सेवाओं पर गंभीर असर पड़ रहा है।

भारत से ज्यादा खतरनाक क्यों साबित हो रही है गर्मी?

भारत में कई इलाकों में हर साल 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंचता है। यहां के लोग, घर, बिजली व्यवस्था और जीवनशैली काफी हद तक गर्म मौसम के अनुरूप विकसित हो चुके हैं।

वहीं यूरोप में अधिकांश घरों में एयर कंडीशनर नहीं हैं, क्योंकि वहां पारंपरिक रूप से मौसम ठंडा रहता है। ऐसे में अचानक आई भीषण गर्मी बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।

सबसे ज्यादा खतरा किन लोगों को?

  • बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग
  • छोटे बच्चे
  • बाहर काम करने वाले मजदूर
  • जिन घरों में एयर कंडीशनर या पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं है

जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता क्लाइमेट चेंज (Climate Change) दुनिया भर में हीटवेव को अधिक लंबा, अधिक तीव्र और अधिक घातक बना रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो भविष्य में ऐसी भीषण गर्मी और अधिक आम हो सकती है।

निष्कर्ष

यूरोप की मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि केवल अधिक तापमान ही नहीं, बल्कि किसी देश की तैयारी, इंफ्रास्ट्रक्चर और जलवायु के अनुरूप व्यवस्था भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि कई बार भारत से कम तापमान होने के बावजूद यूरोप में गर्मी का असर कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हो जाता है।

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