

पश्चिम बंगाल के सरकारी मदरसों में इन दिनों राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नई पहल देखने को मिल रही है। राज्य के कई सरकारी मदरसों में सुबह की प्रार्थना के दौरान छात्रों को वंदे मातरम् सुनाया जा रहा है और शिक्षकों द्वारा इसे याद कराने की कोशिश की जा रही है।
बताया जा रहा है कि राज्य के करीब 614 सरकारी मदरसों में हाल के सप्ताहों से इस दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। कई स्थानों पर शिक्षक मोबाइल फोन, स्पीकर और ऑडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से छात्रों को गीत सुनाकर उसका सही उच्चारण और बोल सिखा रहे हैं।
शुरुआती दौर में छात्रों को हो रही कठिनाई
कई मदरसों में यह देखा गया कि प्रार्थना के दौरान गीत बजने पर कुछ छात्र पूरे आत्मविश्वास के साथ नहीं गा पा रहे हैं। कुछ बच्चे केवल शुरुआती पंक्तियां बोलते हैं, जबकि कई छात्र अभी गीत को याद करने की प्रक्रिया में हैं। शिक्षक इसे सामान्य मानते हुए लगातार अभ्यास करा रहे हैं।
शिक्षकों का कहना है कि जिन छात्रों ने पहले कभी वंदे मातरम् नहीं सीखा, उन्हें इसे याद करने में थोड़ा समय लग रहा है। इसलिए रोजाना अभ्यास कराया जा रहा है ताकि सभी छात्र सही तरीके से राष्ट्रीय गीत गा सकें।
मोबाइल और स्पीकर से कराया जा रहा अभ्यास
कई मदरसों में शिक्षक अपने मोबाइल फोन पर वंदे मातरम् की रिकॉर्डिंग चलाकर बच्चों को सुनाते हैं। इसके बाद छात्र सामूहिक रूप से गीत दोहराते हैं। कुछ संस्थानों में प्रार्थना सभा से पहले भी अतिरिक्त अभ्यास कराया जा रहा है ताकि बच्चे पूरे गीत के शब्द आसानी से याद कर सकें।
सरकार के निर्देश के बाद शुरू हुई प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार, सरकारी निर्देशों के बाद कई मदरसों ने अपनी सुबह की प्रार्थना व्यवस्था में वंदे मातरम् को शामिल करना शुरू किया है। इसके तहत छात्रों को राष्ट्रीय गीत का महत्व भी समझाया जा रहा है और नियमित अभ्यास कराया जा रहा है।
शिक्षा और राष्ट्रीय मूल्यों पर जोर
शिक्षकों का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीतों की जानकारी सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए बच्चों को गीत के शब्द, अर्थ और उसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में भी बताया जा रहा है।
हालांकि, इस विषय पर अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान सभी विद्यार्थियों को सिखाया जाना चाहिए, जबकि कुछ पक्ष इसे लेकर अपनी अलग राय रखते हैं। ऐसे में यह मुद्दा शिक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक चर्चा का विषय भी बना हुआ है।
