

महिला की छाती दबाना, सलवार उतारना… क्या यह रेप की कोशिश नहीं? पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
महिलाओं की सुरक्षा और यौन अपराधों से जुड़े मामलों में एक अहम सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या बेहद संवेदनशील और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
मामला उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें पटना हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि किसी महिला के साथ बंद कमरे में जबरदस्ती की गई, उसका सीना दबाया गया और सलवार उतारने की कोशिश की गई, तो केवल इन तथ्यों के आधार पर इसे “रेप की कोशिश” (Attempt to Rape) नहीं माना जा सकता।
इस टिप्पणी के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई।
क्या था पूरा मामला?
मामले में आरोप था कि आरोपी ने महिला को बंद कमरे में ले जाकर उसके साथ जबरदस्ती की। आरोपों के अनुसार आरोपी ने महिला की छाती दबाई, उसके कपड़े उतारने की कोशिश की और उसके साथ अश्लील हरकतें कीं। निचली अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए कार्रवाई की थी।
हालांकि, बाद में पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने रेप करने की अंतिम मंशा (Intent) और उसके लिए आवश्यक प्रत्यक्ष कदम (Overt Act) उठाया था। इसी आधार पर आरोपी को रेप की कोशिश के आरोप से राहत दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों, कानूनी सिद्धांतों और स्थापित गाइडलाइन का अध्ययन करना चाहिए।
अदालत ने संकेत दिया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है। केवल संकीर्ण कानूनी व्याख्या अपनाने से न्याय प्रभावित हो सकता है।
कानून क्या कहता है?
भारतीय दंड संहिता (अब संबंधित प्रावधान भारतीय न्याय संहिता में समाहित हैं) के तहत “रेप की कोशिश” का निर्धारण केवल अंतिम शारीरिक कृत्य से नहीं होता, बल्कि आरोपी की मंशा (Intent) और उस दिशा में उठाए गए प्रत्यक्ष कदम (Act) भी महत्वपूर्ण होते हैं।
इसी कारण ऐसे मामलों में अदालतें परिस्थितियों, साक्ष्यों और आरोपी के व्यवहार का विस्तृत परीक्षण करती हैं।
महिला सुरक्षा से जुड़ा अहम सवाल
इस मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों में कानून की व्याख्या कितनी संवेदनशील और पीड़िता-केंद्रित होनी चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का पालन न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहद आवश्यक है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में पटना हाईकोर्ट के फैसले की न्यायिक समीक्षा करेगा। अंतिम निर्णय के बाद यह स्पष्ट होगा कि ऐसे मामलों में “रेप की कोशिश” की कानूनी कसौटी को किस प्रकार लागू किया जाएगा। यह फैसला भविष्य में समान मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
