

देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना (Ken-Betwa Link Project) एक बार फिर विवादों में आ गई है। करीब 45,000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर गंभीर कानूनी और तकनीकी सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया है कि परियोजना के लिए वन विभाग द्वारा दी गई मंजूरी से जुड़ी कई अनिवार्य शर्तों का अब तक पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। इसके बावजूद कई स्थानों पर निर्माण कार्य जारी है।
जानकारी के अनुसार, परियोजना के लिए दी गई वन स्वीकृति (Forest Clearance) के तहत प्रभावित परिवारों के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन, पर्यावरणीय शर्तों के पालन और वन भूमि से जुड़े अन्य जरूरी प्रावधानों को समय पर पूरा करना आवश्यक था। आरोप है कि इन महत्वपूर्ण शर्तों का पालन अधूरा रहने के बावजूद निर्माण गतिविधियां जारी रखी गईं।
क्या है पूरा मामला?
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन की सुविधा बढ़ाना है। इसे देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन परियोजना की शुरुआत से ही पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इसके प्रभावों को लेकर चिंता जताई है।
अब सामने आए दस्तावेजों से यह सवाल उठ रहा है कि क्या आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी किए बिना निर्माण कार्य आगे बढ़ाया गया। यदि ऐसा पाया जाता है तो परियोजना की वैधता और भविष्य दोनों पर असर पड़ सकता है।
वन मंजूरी की शर्तों पर सवाल
बताया जा रहा है कि वन स्वीकृति की कई अनिवार्य शर्तें समयबद्ध तरीके से पूरी नहीं की गईं। इनमें प्रमुख रूप से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, वन क्षेत्र के संरक्षण और पर्यावरणीय अनुपालन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन शर्तों का पालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी आवश्यकता है।
परियोजना का महत्व
सरकार का दावा है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र के लाखों लोगों को सिंचाई और पेयजल की सुविधा मिलेगी। इसके साथ ही जल संकट से जूझ रहे इलाकों को राहत मिलने और बिजली उत्पादन बढ़ने की भी उम्मीद है। हालांकि, पर्यावरणीय प्रभाव, वन क्षेत्र पर असर और विस्थापन को लेकर लगातार बहस जारी है।
